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वन पर्व
अध्याय १५४
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वैशम्पाय़न उवाच
समृद्ध्या ह्यस्य लोकस्य लोको युष्माकमृध्यते |  १०   क
इमं च लोकं शोचन्तमनुशोचन्ति देवताः |  १०   ख
पूज्यमानाश्च वर्धन्ते हव्यकव्यैर्यथाविधि ||  १०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति