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द्रोण पर्व
अध्याय १५४
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सञ्जय़ उवाच
आस्थाय़ तं काञ्चनरत्नचित्रं; रथोत्तमं सिंह इवोन्ननाद |  १३   क
वैकर्तनं कर्णमुपेत्य चापि; विव्याध वज्रप्रतिमैः पृषत्कैः ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति