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द्रोण पर्व
अध्याय १५४
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सञ्जय़ उवाच
तौ कर्णिनाराचशिलीमुखैश्च; नालीकदण्डैश्च सवत्सदन्तैः |  १४   क
वराहकर्णैः सविषाणशृङ्गैः; क्षुरप्रवर्षैश्च विनेदतुः खम् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति