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द्रोण पर्व
अध्याय १५४
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सञ्जय़ उवाच
तद्वाणधारावृतमन्तरिक्षं; तिर्यग्गताभिः समरे रराज |  १५   क
सुवर्णपुङ्खज्वलितप्रभाभि; र्विचित्रपुष्पाभिरिव स्रजाभिः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति