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द्रोण पर्व
अध्याय १५४
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सञ्जय़ उवाच
न चाददानो न च सन्दधानो; न चेषुधी स्पृशमानः कराग्रैः |  २३   क
अदृश्यद्वै लाघवात्सूतपुत्रः; सर्वं वाणैश्छादय़ानोऽन्तरिक्षम् ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति