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द्रोण पर्व
अध्याय १५४
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सञ्जय़ उवाच
ततो माय़ां विहितामन्तरिक्षे; घोरां भीमां दारुणां राक्षसेन |  २४   क
सम्पश्यामो लोहिताभ्रप्रकाशां; देदीप्यन्तीमग्निशिखामिवोग्राम् ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति