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द्रोण पर्व
अध्याय १५४
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सञ्जय़ उवाच
अलाय़ुधविषक्तं तु भैमसेनिं महावलम् |  ३   क
दृष्ट्वा कर्णो महावाहुः पाञ्चालान्समुपाद्रवत् ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति