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द्रोण पर्व
अध्याय १५४
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सञ्जय़ उवाच
तां राक्षसीं घोरतरां सुभीमां; वृष्टिं महाशस्त्रमय़ीं पतन्तीम् |  ३३   क
दृष्ट्वा वलौघांश्च निपात्यमाना; न्महद्भय़ं तव पुत्रान्विवेश ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति