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शल्य पर्व
अध्याय ४६
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वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तत्राप्युपस्पृश्य दत्त्वा च विविधं वसु |  १२   क
अग्नितीर्थं महाप्राज्ञः स जगाम प्रलम्वहा |  १२   ख
नष्टो न दृश्यते यत्र शमीगर्भे हुताशनः ||  १२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति