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द्रोण पर्व
अध्याय १५४
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सञ्जय़ उवाच
निर्मर्यादे विद्रवे घोररूपे; सर्वा दिशः प्रेक्षमाणाः स्म शून्याः |  ४३   क
तां शस्त्रवृष्टिमुरसा गाहमानं; कर्णं चैकं तत्र राजन्नपश्यम् ||  ४३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति