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द्रोण पर्व
अध्याय १५४
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सञ्जय़ उवाच
तेनोत्सृष्टा चक्रय़ुक्ता शतघ्नी; समं सर्वांश्चतुरोऽश्वाञ्जघान |  ४६   क
ते जानुभिर्जगतीमन्वपद्य; न्गतासवो निर्दशनाक्षिजिह्वाः ||  ४६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति