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द्रोण पर्व
अध्याय १५४
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सञ्जय़ उवाच
ततोऽव्रुवन्कुरवः सर्व एव; कर्णं दृष्ट्वा घोररूपां च माय़ाम् |  ४८   क
शक्त्या रक्षो जहि कर्णाद्य तूर्णं; नश्यन्त्येते कुरवो धार्तराष्ट्राः ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति