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द्रोण पर्व
अध्याय १५४
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सञ्जय़ उवाच
यासौ राजन्निहिता वर्षपूगा; न्वधाय़ाजौ सत्कृता फल्गुनस्य |  ५३   क
यां वै प्रादात्सूतपुत्राय़ शक्रः; शक्तिं श्रेष्ठां कुण्डलाभ्यां निमाय़ ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति