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वन पर्व
अध्याय २६२
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मार्कण्डेय़ उवाच
प्रपतेद्द्यौः सनक्षत्रा पृथिवी शकलीभवेत् |  ३६   क
शैत्यमग्निरिय़ान्नाहं त्यजेय़ं रघुनन्दनम् ||  ३६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति