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द्रोण पर्व
अध्याय १५४
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सञ्जय़ उवाच
तेषां ज्यातलनिर्घोषो रथनेमिस्वनश्च ह |  ७   क
मेघानामिव घर्मान्ते वभूव तुमुलो निशि ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति