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द्रोण पर्व
अध्याय १५४
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सञ्जय़ उवाच
ज्यानेमिघोषस्तनय़ित्नुमान्वै; धनुस्तडिन्मण्डलकेतुशृङ्गः |  ८   क
शरौघवर्षाकुलवृष्टिमांश्च; सङ्ग्राममेघः स वभूव राजन् ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति