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वन पर्व
अध्याय १७७
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युधिष्ठिर उवाच
वेद्यं सर्प परं व्रह्म निर्दुःखमसुखं च यत् |  १७   क
यत्र गत्वा न शोचन्ति भवतः किं विवक्षितम् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति