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आदि पर्व
अध्याय १५५
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देव्यु उवाच
अवलिप्तं मे मुखं व्रह्मन्पुण्यान्गन्धान्विभर्मि च |  ३५   क
सुतार्थेनोपरुद्धास्मि तिष्ठ याज मम प्रिय़े ||  ३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति