आदि पर्व  अध्याय १५५

व्राह्मण उवाच

कुमारी चापि पाञ्चाली वेदिमध्यात्समुत्थिता |  ४१   क
सुभगा दर्शनीय़ाङ्गी वेदिमध्या मनोरमा ||  ४१   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति