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द्रोण पर्व
अध्याय १५८
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सञ्जय़ उवाच
श्रुत्वा कृष्णस्य वचनं धर्मराजो युधिष्ठिरः |  २५   क
विमृज्य नेत्रे पाणिभ्यां कृष्णं वचनमव्रवीत् ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति