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आदि पर्व
अध्याय १५५
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व्राह्मण उवाच
तच्छ्रुत्वा सर्वपाञ्चालाः प्रणेदुः सिंहसङ्घवत् |  ४६   क
न चैतान्हर्षसम्पूणानिय़ं सेहे वसुन्धरा ||  ४६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति