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आदि पर्व
अध्याय १५५
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व्राह्मण उवाच
तौ दृष्ट्वा पृषती याजं प्रपेदे वै सुतार्थिनी |  ४७   क
न वै मदन्यां जननीं जानीय़ातामिमाविति ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति