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वन पर्व
अध्याय १५५
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वैशम्पाय़न उवाच
क्वचिज्जगाम पद्भ्यां तु राक्षसैरुह्यते क्वचित् |  १२   क
तत्र तत्र महातेजा भ्रातृभिः सह सुव्रतः ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति