वन पर्व  अध्याय १५५

वैशम्पाय़न उवाच

अष्टमेऽहनि सम्प्राप्ते तमृषिं लोकविश्रुतम् |  २०   क
आमन्त्र्य वृषपर्वाणं प्रस्थानं समरोचय़न् ||  २०   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति