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वन पर्व
अध्याय १५५
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वैशम्पाय़न उवाच
ते समासाद्य पन्थानं यथोक्तं वृषपर्वणा |  २९   क
अनुसस्रुर्यथोद्देशं पश्यन्तो विविधान्नगान् ||  २९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति