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वन पर्व
अध्याय १५५
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वैशम्पाय़न उवाच
ते मृगद्विजसङ्घुष्टं नानाद्विजसमाकुलम् |  ३२   क
शाखामृगगणैश्चैव सेवितं सुमनोहरम् ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति