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शल्य पर्व
अध्याय २५
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सञ्जय़ उवाच
दुर्मर्षणो महाराज जैत्रो भूरिवलो रविः |  ४   क
इत्येते सहिता भूत्वा तव पुत्राः समन्ततः |  ४   ख
भीमसेनमभिद्रुत्य रुरुधुः सर्वतोदिशम् ||  ४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति