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वन पर्व
अध्याय १५५
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वैशम्पाय़न उवाच
द्रौपदीसहिता वीरास्तैश्च विप्रैर्महात्मभिः |  ३८   क
शृण्वन्तः प्रीतिजननान्वल्गून्मदकलाञ्शुभान् |  ३८   ख
श्रोत्ररम्यान्सुमधुराञ्शव्दान्खगमुखेरितान् ||  ३८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति