वन पर्व  अध्याय १५५

वैशम्पाय़न उवाच

पनसाँल्लिकुचान्मोचान्खर्जूरानाम्रवेतसान् |  ४१   क
पारावतांस्तथा क्षौद्रान्नीपांश्चापि मनोरमान् ||  ४१   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति