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वन पर्व
अध्याय १५५
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वैशम्पाय़न उवाच
सरांसि च विचित्राणि प्रसन्नसलिलानि च |  ४९   क
कुमुदैः पुण्डरीकैश्च तथा कोकनदोत्पलैः |  ४९   ख
कह्लारैः कमलैश्चैव आचितानि समन्ततः ||  ४९   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति