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भीष्म पर्व
अध्याय ७३
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सञ्जय़ उवाच
एतस्मिन्नेव काले तु द्रोणः शस्त्रभृतां वरः |  ४४   क
द्रुपदं त्रिभिरासाद्य शरैर्विव्याध दारुणैः ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति