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वन पर्व
अध्याय १५५
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वैशम्पाय़न उवाच
कृत्वैव केकामधुरं सङ्गीतमधुरस्वरम् |  ५४   क
चित्रान्कलापान्विस्तीर्य सविलासान्मदालसान् |  ५४   ख
मय़ूरान्ददृशुश्चित्रान्नृत्यतो वनलासकान् ||  ५४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति