वन पर्व  अध्याय ९२

लोमश उवाच

चरमाणास्तपो नित्यं स्पर्शनादम्भसश्च ते |  १८   क
तीर्थाभिगमनात्पूता दर्शनाच्च महात्मनाम् ||  १८   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति