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वन पर्व
अध्याय १५५
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वैशम्पाय़न उवाच
कांश्चिच्छकुनजातांश्च विटपेषूत्कटानपि |  ५६   क
कलापरचिताटोपान्विचित्रमुकुटानिव |  ५६   ख
विवरेषु तरूणां च मुदितान्ददृशुश्च ते ||  ५६   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति