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वन पर्व
अध्याय १५५
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वैशम्पाय़न उवाच
पद्मोत्पलविचित्राणि सुखस्पर्शजलानि च |  ६७   क
गन्धवन्ति च माल्यानि रसवन्ति फलानि च |  ६७   ख
अतीव वृक्षा राजन्ते पुष्पिताः शैलसानुषु ||  ६७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति