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वन पर्व
अध्याय १५५
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वैशम्पाय़न उवाच
रक्तपीतारुणाः पार्थ पादपाग्रगता द्विजाः |  ७४   क
परस्परमुदीक्षन्ते वहवो जीवजीवकाः ||  ७४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति