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उद्योग पर्व
अध्याय ४७
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सञ्जय़ उवाच
यदा विपाठा मद्भुजविप्रमुक्ता; द्विजाः फलानीव महीरुहाग्रात् |  ५२   क
प्रच्छेत्तार उत्तमाङ्गानि यूनां; तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति