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वन पर्व
अध्याय १५५
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वैशम्पाय़न उवाच
वहुतालसमुत्सेधाः शैलशृङ्गात्परिच्युताः |  ७८   क
नानाप्रस्रवणेभ्यश्च वारिधाराः पतन्त्यमूः ||  ७८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति