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वन पर्व
अध्याय १५५
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वैशम्पाय़न उवाच
क्वचिदञ्जनवर्णाभाः क्वचित्काञ्चनसंनिभाः |  ८०   क
धातवो हरितालस्य क्वचिद्धिङ्गुलकस्य च ||  ८०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति