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वन पर्व
अध्याय ८०
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पुलस्त्य उवाच
ततो गच्छेत धर्मज्ञ भीमाय़ाः स्थानमुत्तमम् |  १००   क
तत्र स्नात्वा तु योन्यां वै नरो भरतसत्तम ||  १००   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति