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वन पर्व
अध्याय १५५
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वैशम्पाय़न उवाच
व्यालैश्च विविधाकारैः शतशीर्षैः समन्ततः |  ८७   क
उपेतं पश्य कौन्तेय़ शैलराजमरिन्दम ||  ८७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति