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वन पर्व
अध्याय १५५
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वैशम्पाय़न उवाच
ते प्रीतमनसः शूराः प्राप्ता गतिमनुत्तमाम् |  ८८   क
नातृप्यन्पर्वतेन्द्रस्य दर्शनेन परन्तपाः ||  ८८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति