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कर्ण पर्व
अध्याय ६३
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सञ्जय़ उवाच
वृषसेनं हतं दृष्ट्वा शोकामर्षसमन्वितः |  १   क
मुक्त्वा शोकोद्भवं वारि नेत्राभ्यां सहसा वृषः ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति