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उद्योग पर्व
अध्याय १५५
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वैशम्पाय़न उवाच
स समासाद्य वार्ष्णेय़ं योगानामीश्वरं प्रभुम् |  १४   क
व्यंसितो व्रीडितो राजन्नाजगाम स कुण्डिनम् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति