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विराट पर्व
अध्याय १५
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वैशम्पाय़न उवाच
अकालज्ञासि सैरन्ध्रि शैलूषीव विधावसि |  ३४   क
विघ्नं करोषि मत्स्यानां दीव्यतां राजसंसदि |  ३४   ख
गच्छ सैरन्ध्रि गन्धर्वाः करिष्यन्ति तव प्रिय़म् ||  ३४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति