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उद्योग पर्व
अध्याय १५५
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वैशम्पाय़न उवाच
धारय़न्गाण्डिवं दिव्यं धनुस्तेजोमय़ं दृढम् |  ३०   क
अक्षय़्यशरसंय़ुक्तो दिव्यास्त्रपरिवृंहितः ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति