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उद्योग पर्व
अध्याय १५५
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वैशम्पाय़न उवाच
त्रीण्येवैतानि दिव्यानि धनूंषि दिविचारिणाम् |  ५   क
वारुणं गाण्डिवं तत्र माहेन्द्रं विजय़ं धनुः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति