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उद्योग पर्व
अध्याय १५५
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वैशम्पाय़न उवाच
षोडश स्त्रीसहस्राणि रत्नानि विविधानि च |  ९   क
प्रतिपेदे हृषीकेशः शार्ङ्गं च धनुरुत्तमम् ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति