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द्रोण पर्व
अध्याय १५५
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सञ्जय़ उवाच
समुद्रस्येव सङ्क्षोभो मेरोरिव विसर्पणम् |  १०   क
तथैतल्लाघवं मन्ये तव कर्म जनार्दन ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति