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द्रोण पर्व
अध्याय १५५
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वासुदेव उवाच
गाण्डीवमाय़म्य भवांश्चक्रं वाहं सुदर्शनम् |  १७   क
न शक्तौ स्वो रणे जेतुं तथाय़ुक्तं नरर्षभम् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति